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Raipur. रायपुर। सरसों की खेती कम लागत, कम पानी और कम समय (3-4 महीने) में अधिक मुनाफा देने वाली प्रमुख रबी तिलहन फसल है। यह हर तरह की मिट्टी में उगाई जा सकती है, जो किसानों के लिए तेल की मात्रा के साथ अच्छा बाजार भाव प्रदान करती है। सरसों की गहरी जड़ें मिट्टी की संरचना में सुधार करती हैं और यह खरपतवार को कम करती है। बाजार में सरसों के तेल की निरंतर मांग के कारण किसानों को इसके बेहतर दाम मिलते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र, बलरामपुर द्वारा किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रोत्साहित करने के लिए लगातार प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन दिया जा रहा है।
बलरामपुर-रामानुजगंज जिला के विकासखण्ड बलरामपुर के ग्राम रामनगर के प्रगतिशील किसान श्री वैजनाथ ठाकुर ने प्राकृतिक खेती अपनाकर अपनी आय में वृद्धि की साथ ही क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बने है। जिले के किसान पारंपरिक रूप से खरीफ में धान और रबी में गेहूं व सरसों की खेती करते रहे हैं। श्री ठाकुर भी पूर्व में रबी सीजन में ऊंचाई वाले परती क्षेत्र में पारंपरिक पद्धति से सरसों की खेती करते थे। स्थानीय बीजों और असंतुलित उर्वरकों के उपयोग के कारण उत्पादन सीमित और लागत अधिक होने से मुनाफा कम मिलता था।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में श्री ठाकुर ने प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाया। उन्होंने उन्नत बीज, कतार बुवाई पद्धति तथा बीजामृत से बीज उपचार जैसे उपाय अपनाए। परिणामस्वरूप बीज अंकुरण दर में वृद्धि हुई और फसल को बीज एवं मिट्टी जनित रोगों से सुरक्षा मिली। साथ ही जीवामृत एवं घनजीवामृत के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार हुआ। पौध संरक्षण के लिए उन्होंने नीमास्त्र एवं अग्निास्त्र जैसे जैविक उपाय अपनाए, जिससे कीट एवं रोगों पर प्रभावी नियंत्रण मिला। वे बताते है कि कृषि विज्ञान केन्द्र के मार्गदर्शन में रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम हुई। अब प्राकृतिक खेती के कारण मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ, जिससे दीर्घकालीन उत्पादन क्षमता भी बढ़ी है। प्राकृतिक खेती से श्री ठाकुर को कम लागत में बेहतर लाभ प्राप्त हुआ।
श्री ठाकुर को जहां पारंपरिक पद्धति में सरसों की उपज 8.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार लेता था, वहीं प्राकृतिक खेती में लगभग 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हुई। वे बताते है कि उत्पादन थोड़ा कम रहा, लेकिन लागत में कमी के कारण शुद्ध लाभ अधिक मिला। साथ ही उन्होंने भविष्य में मूंग और टमाटर की फसल लेने की योजनाअ बनाई है। उन्होंने प्राकृतिक खेती के सकारात्मक परिणामों से उत्साहित होकर धान की खेती भी इसी पद्धति से शुरू की।
श्री ठाकुर ने ओडिशा से प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया और अपने अनुभवों को अन्य किसानों के साथ साझा करते हुए उन्हें भी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से क्षेत्र के कई किसान अब प्राकृतिक खेती अपनाने लगे हैं। प्राकृतिक खेती किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी सिद्ध हो रही है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य सुधार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा लगातार प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रम और तकनीकी सहायता के माध्यम से किसानों को नई तकनीकों से जोड़ा जा रहा है। इससे किसानों में आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल रही है।
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